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रूस से लेकर सऊदी तक…, ईरान-इजरायल महा-युद्ध में भारत के ‘5 पक्के दोस्त’ किसका देंगे साथ?

रूस से लेकर सऊदी तक..., ईरान-इजरायल महा-युद्ध में भारत के '5 पक्के दोस्त' किसका देंगे साथ?

Iran Israel Conflict: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को लेकर लगातार सख्त बयानबाजी और सैन्य चेतावनियों के बीच 28 फरवरी को पश्चिम एशिया में हालात अचानक गंभीर हो गए।

इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए, जिनमें शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक ईरान के कुछ संवेदनशील ठिकानों, यहां तक कि परमाणु सुविधाओं को भी निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइलें दागीं। दोनों देशों के बीच तेज होती सैन्य कार्रवाई ने पूरे मिडिल ईस्ट को युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह टकराव जल्द नहीं थमा तो इसका असर क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर वैश्विक स्तर पर दिखाई देगा।

इस संघर्ष के बीच भारत ने संतुलित और सतर्क रुख अपनाया है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ किया है कि भारत किसी भी पक्ष का समर्थन करने के बजाय स्थिति पर नजर रख रहा है और संयम की अपील करता है। भारत के लिए यह स्थिति कूटनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उसके घनिष्ठ संबंध अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, फ्रांस और कतर जैसे देशों से हैंऔर इन सभी की इस संघर्ष में अलग-अलग भूमिका और हित हैं।

ईरान-इजराइल टकराव में अमेरिका स्पष्ट रूप से इजराइल के साथ खड़ा नजर आ रहा है। हालांकि अमेरिका की स्थिति पूरी तरह आक्रामक नहीं मानी जा रही, क्योंकि वह ईरान के साथ परमाणु समझौते को लेकर बातचीत भी कर रहा था। दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी थी और अगला दौर ओमान में प्रस्तावित था, लेकिन मौजूदा तनाव ने उस प्रक्रिया को अधर में डाल दिया है। अमेरिका ने संकेत दिया है कि बातचीत का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन इजराइल की सैन्य कार्रवाई से हालात और जटिल हो गए हैं।

दूसरी ओर सऊदी अरब की स्थिति संतुलित लेकिन संवेदनशील है। सऊदी अरब ने हालिया घटनाक्रम पर चिंता जताई है और संयम बरतने की अपील की है। परंपरागत रूप से सऊदी और ईरान के संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में दोनों के बीच कूटनीतिक संवाद बढ़ा है। ऐसे में यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सऊदी अरब खुलकर किसी पक्ष में खड़ा होता है या मध्यस्थ की भूमिका निभाता है।

रूस भी इस समीकरण में अहम खिलाड़ी है। रूस ने शांति और बातचीत का समर्थन किया है, लेकिन अमेरिका के साथ उसके तनावपूर्ण संबंध इस संघर्ष को और पेचीदा बना सकते हैं। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस और अमेरिका के रिश्ते पहले ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में यदि अमेरिका खुलकर इजराइल के साथ खड़ा रहता है, तो रूस का झुकाव ईरान की ओर बढ़ सकता है, भले ही वह औपचारिक रूप से शांति की अपील करता रहे।

फ्रांस ने भी संयम की बात की है, लेकिन उसका झुकाव इजराइल की सुरक्षा चिंताओं की ओर माना जा रहा है। फ्रांस ने ईरान से बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। वहीं कतर ने इजराइल की कार्रवाई की आलोचना की है और तनाव के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया है, हालांकि वह खुद को शांति समर्थक देश के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

कुल मिलाकर, यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक शक्तियों के हित जुड़े हुए हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने और अपने रणनीतिक, ऊर्जा व प्रवासी हितों की रक्षा करने की है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह टकराव सीमित सैन्य कार्रवाई तक रहता है या व्यापक युद्ध का रूप लेता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।

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