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अयातुल्ला खामेनेई ने 45 सालों तक क्यों अपना एक हाथ छिपाए रखा, ईरान में कैसे बनाई अपनी पकड़?

अयातुल्ला खामेनेई ने 45 सालों तक क्यों अपना एक हाथ छिपाए रखा, ईरान में कैसे बनाई अपनी पकड़?

नई दिल्ली। ईरान की धार्मिक सत्ता के सबसे शक्तिशाली स्तंभ रहे अयातुल्ला अली खामेनेई का 86 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने देश को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

हालांकि, उनके शासनकाल ने ईरान को इजरायल और अमेरिका के साथ परमाणु कार्यक्रम पर गहरे टकराव की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। साथ ही, उन्होंने दशकों तक देश के भीतर लोकतांत्रिक विरोध को कुचलने में भी अपनी सत्ता का पूरा उपयोग किया और क्षेत्रीय छद्म युद्धों के जरिये अपनी शक्ति बनाए रखी।

सत्ता का सुदृढ़ीकरण और विरासत

1989 में अयातुल्ला रुहोल्ला खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता की बागडोर संभाली। तब उन्हें एक ‘कमजोर’ नेता माना जाता था। उनके पास न तो खोमैनी जैसा करिश्मा था और न ही अपेक्षित धार्मिक वरिष्ठता। जहां खुमैनी एक करिश्माई और उग्र क्रांतिकारी विचारधारा वाले नेता थे, वहीं खामेनेई की छवि एक कठोर और प्रशासनिक नेता की थी।

उनके शासनकाल के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे।

रिवोल्यूशनरी गार्ड

खामेनेई ने एक ऐसा सुरक्षा तंत्र (IRGC) विकसित किया जो सीधे उनके प्रति वफादार था। उन्होंने इस अर्धसैनिक बल को न केवल ईरान की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य इकाई बनाया, बल्कि इसे देश की आर्थिक व्यवस्था का एक शक्तिशाली केंद्र भी बना दिया। यह बल देश के बैलिस्टिक मिसाइल शस्त्रागार का नियंत्रण करता है।

प्रशासनिक पकड़

खामेनेई ने शिया धर्मगुरुओं और सरकारी एजेंसियों का एक नौकरशाही तंत्र खड़ा किया, जिससे जिम्मेदारियां अस्पष्ट हो गईं और वे ही अंतिम निर्णयकर्ता बन गए। उन्होंने सरकारी एजेंसियों में अपने नियुक्त व्यक्तियों के माध्यम से चुनी हुई नागरिक सरकार को निरंतर नियंत्रित रखा।

क्षेत्रीय और वैश्विक टकराव

उनके नेतृत्व में ईरान ने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, जिससे अमेरिका और इजरायल के साथ उसका निरंतर तनाव बना रहा। उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते को केवल इसलिए मंजूरी दी थी ताकि प्रतिबंधों से राहत पाकर अपनी सत्ता को स्थिर कर सकें। लेकिन, 2018 में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समझौते से हटने के बाद खामेनेई ने फिर से कड़ा रुख अपना लिया।

प्रारंभिक जीवन और उदय

खामेनेई का जन्म 1939 में उत्तरपूर्वी ईरान में स्थित मशहद शहर के एक धार्मिक परिवार में हुआ था। 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान, वे अयातुल्ला खुमैनी के कट्टर समर्थक बने और रिवोल्यूशनरी काउंसिल में शामिल हुए।

1981 में वे ईरान के तीसरे राष्ट्रपति चुने गए। उसी वर्ष, एक बम विस्फोट में उनका एक हाथ स्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गया था। शुरुआती दौर में उनकी धार्मिक साख पर सवाल उठाए गए थे क्योंकि वे शिया पदानुक्रम में ‘होजतुलइस्लाम’ के अपेक्षाकृत निचले स्तर पर थे। हालांकि, सर्वोच्च नेता बनने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत की और ‘ग्रैंड अयातुल्ला’ के पद तक पहुंचे।

अपनी कमियों को स्वीकार करते हुए उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता से ईरान को इराक के साथ युद्ध के बाद स्थिरता प्रदान की और खुमैनी से भी लंबे समय तक शासन किया। खामेनेई का जाना ईरान के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है। उनके द्वारा छोड़ी गई यह विरासत न केवल जटिल है, बल्कि आने वाले समय में ईरान की आंतरिक और बाह्य नीतियों पर भी बड़ा प्रभाव डालेगी।

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