संगठनात्मक इकाइयों के कमजोर होने से बिखर रही मध्य प्रदेश में कांग्रेस


भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में 2003 से शुरू हुआ संगठनात्मक बिखराव हर चुनाव के बाद बढ़ता जा रहा है। संगठन की सहयोगी इकाइयों के लगभग निष्क्रिय रहने और नए नेतृत्व को स्थान नहीं मिलने से पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का पार्टी से स्वाभाविक जुड़ाव रस्म बनकर रह गया है। हाल ही में हुए 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव ने संगठन की कमियों को इस हद तक सार्वजनिक कर दिया कि पार्टी नेता अब वर्षों से पार्टी पर एकाधिकार जमाए नेताओं के खिलाफ बातें करने लगे हैं।
पार्टी की सहयोगी लेकिन प्रमुख इकाइयां युवा मोर्चा, एनएसयूआइ, सेवादल, महिला मोर्चा आदि का वजूद सार्वजनिक तौर पर बहुत कम या अवसर विशेष पर नजर आता है। जबकि यही वे इकाइयां होती हैं, जो सरकार की नीतियों के खिलाफ जनआक्रोश जनता के बीच लेकर जाती हैं। कांग्रेस में युवा मोर्चा, एनएसयूआइ और महिला कांग्रेस की नई कार्यकारिणी के गठन का लंबे समय से इंतजार किया जा रहा है। नई कार्यकारिणी नहीं बनने से इनके मैदानी प्रदर्शन पर काफी बुरा असर पड़ा है।
दूसरी पार्टी के समकक्ष बेहतर स्थिति में
पार्टी पदाधिकारी व्यक्तिगत चर्चा में संगठन की कमियों को बेहद अफसोसजनक मानते हैं। उनका कहना है कि अन्य पार्टियों (विशेषकर भाजपा) में आज जो लोग राष्ट्रीय या प्रदेश में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, उनका राजनीतिक सफर भी उन्हीं के साथ शुरू हुआ था।
कांग्रेस में वरिष्ठता के नाम पर आज भी दशकों पुराने नेता ही जमे हुए हैं। प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की ओर से ऐसा कोई नाम नहीं उभरा, जिस पर सभी की सहमति हो। वरिष्ठों के असुरक्षा भाव ने नए नेतृत्व को आगे नहीं आने दिया और आज नेतृत्व का संकट प्रदेश में मौजूद है। पहले सत्ता गंवाने और फिर विधानसभा चुनावों में हार के बाद संगठन में बिखराव बढ़ गया है।
पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन
वर्ष 2003- 229 सीटों में से 38 पर जीत
वर्ष 2008- 228 सीटों में से 71 पर जीत
वर्ष 2013- 229 सीटों में से 58 पर जीत
वर्ष 2018- 229 सीटों में से 114 पर जीत
उपचुनाव 2020- 28 सीटों में से 9 पर जीत



