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एक साल में जहरीली शराब से 50 से ज्यादा मौतें, आबकारी आयुक्त ने उड़ाई सीएम के आदेश की धज्जियां

मध्यप्रदेश के राजस्व पर राजीव चंद्र रूपी ग्रहण कुछ ऐसा मंडरा रहा है कि दुबे के आते ही बिगड़ी आबकारी व्यवस्थाए उम्मीद के मुताबिक नहीं मिला राजस्व, वही प्रदेश में अवैध शराब का कारोबार भी तेजी से बढ़ने लगा है,

शिवराज की किरकिरी कराने वाले फैसलों से निशाने पर आए प्रदेश के आबकारी आयुक्त राजीव चंद्र दुबे इन दिनों
शिवराज सरकार के साथ-साथ भाजपा संगठन के निशाने
पर भी हैं। कोरोना काल और विपरीत हालातों में बिगड़ी राजस्व व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिस उम्मीद के साथ उन्हें आबकारी की कमान सौंपी गई थी, उसमें वे न केवल नाकाम साबित हुए बल्कि सरकार की किरकिरी कराने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके गलत फैसले सरकार पर भारी पड़ने लगे, अवैध शराब माफिया
के प्रति उनकी नरमी ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।

संभवत: वे प्रदेश के ऐसे पहले आबकारी आयुक्त हैं, जिनके कार्यकाल में अवैध और नकली शराब का कारोबार तेजी से फला-फूला और दर्जनों लोगों
की जानें गईं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस से नजदीकियों के चलते वे अब तक कार्यवाई से बचे हुए हैं।

कोरोना काल में लगातार तीन महीने से ज्यादा दुकानों
के बंद रहने के कारण सरकार के खजाने की हालत पतली हो गई थी। आबकारी से सरकार अपनी माली हालत सुधारना चाहती थी,

इसलिए उन्होंने शराब कारोबारियों से बैर लेकर शुरुआत में खुद दुकानें चलाने का कदम भी उठाया, लेकिन मुख्यालय स्तर से प्रशासनिक लापरवाही, ढीली कायज़्प्रणाली और अराजकता के कारण सरकार को उम्मीद के अनुसार इसका परिणाम नहीं मिल सका।

प्रदेश में आबकारी के काम को सुचारू और व्यवस्थित रूप से चलाए रखने के लिए शराब कारोबारियों के तमाम सुझावों को भी आयुक्त की हठधमिज़्ता/असहमति के कारण ही नहीं माना गया, जिससे न केवल व्यवस्था बिगड़ी बल्कि राजस्व का नुकसान भी हुआ,

पिछले वित्तीय वषज़् 2019-20 में सरकार को आबकारी से
8,321 करोड़ रुपए की आय हुई थी, जबकि इस साल यानि 2020-21 में 10 हजार 318 करोड़ रुपए की कमाई की उम्मीद थी। अब तक सरकार इस आंकड़े से काफी दूर है, पहली बार आमने-सामने हुए कारोबारी और
सरकार प्रशासनिक कामकाज के दौरान अक्सर ऐसा होता है,
जहां विभागों और उनसे दूसरे पक्षों के बीच असहमतियां बनती हैं, टकराव होता है और यहां तक कि प्रदशज़्न भी होते हैं, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी अपनी
सूझ-बूझ ऐसे मामलों में मध्यस्थ मागज़् निकालकर दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं।

शराब के मामले में विभागध्यक्ष होने के नाते आबकारी आयुक्त राजीव चंद्र दुबे पूरी तरह फेल साबित हुए। वे न तो सरकार का पक्ष बेहतर तरीके से रख पाए
और न ही शराब ठेकेदारों का।

यही कारण रहा कि दोनों पक्षों में टकराव होता रहा और मामला हाईकोटज़् तक जा पहुंचा। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सबसे ज्यादा नुकसान सरकार को हुआ।

एक तरफ राजस्व में गिरावट आई, दूसरी तरफ नई आबकारी नीति भी लागू नहीं हो पाई।
सीएम को झूठा साबित किया, उनके आदेशो की किरकिरी कराई
आबकारी आयुक्त पर इन दिनों उंगलियां भी उठ रही हैं कि नई शराब दुकानें प्रस्ताव मंगाकर
उन्होंने एक तरफ मुख्यमंत्री को
झूठा साबित कर दिया तो दूसरी तरफ पूरी सरकार और संगठन की भी किरकिरी करा दी।

आबकारी आयुक्त दुबे के फरमान के बाद ही भाजपा की वरिष्ठ
नेत्री उमा भारती को मध्यप्रदेश में शराबबंदी के लिए आंदोलन करने की घोषणा करनी पड़ी। मुख्यमंत्री
शिवराज सिंह चौहान कई बार सर्वजनिक मंचों से घोषणा कर चुके हैं कि प्रदेश में अब शराब की नई दुकान नहीं खुलेगी। उनकी इस घोषणा के बावजूद आबकारी आयुक्त ने सभी जिलों के आबकारी अधिकारियों को निर्देश जारी कर नई दुकानें खोलने के प्रस्ताव मांग लिए।

इस पर हल्ला मचने के बाद उन्हें
अपने निदेज़्श वापस लेने पड़े। निर्देश वापस लेने के बाद नई
शराब दुकानें खोलने की कवायद तो थम गई लेकिन भाजपा के
वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ विपक्ष के निशाने पर भी मुख्यमंत्री और उनकी सरकार आ गई। इसके बाद मुख्यमंत्री को बार-बार सफाई देनी पड़ रही है।
नवाचार बताने पर भड़का संगठन
आबकारी आयुक्त से सत्ता और संगठन के लोग इसलिए भी
नाराज़ बताए जा रहे हैं कि शराब की नई दुकानें खोलने को उन्होंने नवाचार के तौर पर पेश किया।

विभाग ने तकज़् दिया था कि शराब दुकानों की संख्या में वृद्धि
होने से अवैध और जहरीली शराब की बिक्री पर रोक लगने
के साथ ही राजस्व में भी वृद्धि होगी।

एक साल में जहरीली शराब से 50 से ज्यादा मौतें

मध्यप्रदेश में पिछले एक साल के अंदर जहरीली और अवैध शराब के चलते मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। उज्जैन में जहरीली शराब से करीब 20 मौतों के बाद रतलाम में भी
ऐसी घटना सामने आई थी। हाल ही में मुरैना में 27 से ज्यादा
लोग जहरीली शराब के कारण काल के गाल में समा गए हैं।
तीन दिन पहले छतरपुर में 4 लोगों की मौत हो गई। उज्जैन और मुरैना घटना के बाद मुख्यमंत्री ने सख्त
कार्यवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि प्रदेश में किसी कीमत पर अवैध शराब नहीं बिक पाएगी, लेकिन सरकार इस पर अंकुश लगाने में नाकाम नजर आई है।

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