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पीएम मोदी के भाषण पर मचा कोहराम, 700 दिग्गजों ने चुनाव आयोग से कर दी शिकायत, क्या खतरे में है निष्पक्ष चुनाव?

पीएम मोदी के भाषण पर मचा कोहराम, 700 दिग्गजों ने चुनाव आयोग से कर दी शिकायत, क्या खतरे में है निष्पक्ष चुनाव?

नई दिल्ली, साल 2026 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 18 अप्रैल को दिया गया ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ अब एक बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गया है।

देश के 700 से अधिक नामचीन नागरिकों, जिनमें पूर्व नौकरशाह, पत्रकार, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक कड़ा पत्र लिखा है। इन शिकायतकर्ताओं का सीधा आरोप है कि पीएम का यह संबोधन आदर्श आचार संहिता (MCC) का खुला उल्लंघन है। उनका कहना है कि सरकारी मंचों का इस्तेमाल कर सत्ताधारी दल को चुनाव में फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है, जो लोकतंत्र के लिए एक खतरे की घंटी है।

सरकारी टीवी पर ‘चुनावी’ प्रहार!

विवाद की जड़ 18 अप्रैल की रात 8:30 बजे प्रसारित हुआ वह भाषण है, जिसमें पीएम मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और सपा जैसे विपक्षी दलों को जमकर घेरा। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे विपक्ष के इस कदम के लिए उनसे माफी मांगने को कहें। शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी माध्यमों पर इस तरह का पक्षपाती संबोधन देना सरासर गलत है। यह उस वक्त हुआ जब असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया जारी है और 4 मई को नतीजे आने हैं।

आचार संहिता की उड़ी धज्जियां?

चुनाव आचार संहिता के नियम बहुत साफ हैं-चुनाव के दौरान कोई भी मंत्री अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं कर सकता। सरकारी मशीनरी या मीडिया का उपयोग किसी एक पार्टी के फायदे के लिए करना पूरी तरह वर्जित है। शिकायत में कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने ‘राष्ट्रहित’ के नाम पर चुनावी लाभ लेने की कोशिश की है, जो सरकारी संसाधनों का सीधा दुरुपयोग है। बुद्धिजीवियों ने चुनाव आयोग से सवाल पूछा है कि क्या इस तरह की निष्पक्षता से ही देश में चुनाव संपन्न होंगे?

विपक्ष को भी मिले बराबर का मौका

20 अप्रैल को भेजे गए इस पत्र में मांग की गई है कि इस पूरे मामले की गहन जांच हो। अगर आचार संहिता का उल्लंघन पाया जाता है, तो इस भाषण को सभी प्लेटफॉर्म्स से तुरंत हटाया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कानूनी गाज गिरे। साथ ही, एक दिलचस्प मांग यह भी रखी गई है कि यदि चुनाव आयोग ने पीएम को इस प्रसारण की अनुमति दी थी, तो विपक्षी दलों को भी सरकारी मीडिया पर अपनी बात रखने के लिए उतना ही समय दिया जाना चाहिए। यह पत्र सीधे तौर पर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।

शिकायत करने वालों में शामिल हैं ये बड़े नाम

इस विरोध की आवाज इसलिए भी बुलंद है क्योंकि इसमें देश के सबसे सम्मानित लोग शामिल हैं। शिकायत पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, योगेंद्र यादव, अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर और जयति घोष, प्रसिद्ध संगीतकार टीएम कृष्णा और वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता जैसे नाम हैं। इनके अलावा अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर, जोया हसन और पूर्व राजदूत मधु भादुड़ी जैसे करीब 700 दिग्गजों ने इस शिकायत को एक राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया है।

राजनीतिक गलियारों में आया भूचाल

यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री के शब्दों पर सवाल उठे हैं। सीपीआई के राज्यसभा सांसद पी. संदोष कुमार ने भी अलग से शिकायत दर्ज कराई है। वहीं, महुआ मोइत्रा और मनोज झा जैसे नेताओं ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर मोर्चा खोल दिया है। हालांकि, बीजेपी ने भी बंगाल चुनावों के संदर्भ में विपक्ष पर पलटवार करते हुए शिकायतें की हैं, लेकिन पीएम के संबोधन पर अब तक चुनाव आयोग ने चुप्पी साध रखी है। अब देखना यह है कि आयोग इस पर कोई कड़ा एक्शन लेता है या इसे महज ‘चुनावी शोर’ मानकर छोड़ देता है।

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